कोविड 19 के दौरान घरेलू हिंसा - एक समानांतर महामारी

 'घरेलू हिंसा' से तात्पर्य है ऐसी हिंसा जो निजी, आपसी मतभेद के कारण उत्पन्न हो | हमारा भारतीय समाज अंग्रेजों से आजाद होने के बाद पितृसत्ता का गुलाम हो गया जिसके फलस्वरूप महिलाओं की शक्ति क्षीण हो गई। आज़ादी से पहले जहाँ हमें अनेक वीरांगनाओं की कहानी सुनने को मिलती हैं जिन्होंने अपने पराक्रम से अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। वहीं यदि हम आजादी के बाद की नारियों को देखें वे कहीं न कहीं पितृसत्ता के भार के नीचे दब गईं । कई वर्षों तक महिलाएं इसी प्रणाली के अंतर्गत केवल एक घरेलू बंधन से युक्त रही । भारतीय समाज में दहेज प्रथा का चलन रहा, जो कई महिलाओं को पीड़ित कर चुका है । इस प्रथा के कारण लड़की के परिवार वालों से कई वस्तुएं उपहार स्वरूप ली जाती है जब विवाह होता है। उचित मात्रा में दहेज न मिलने के कारण ससुराल में लड़की को अनेक यातनाएं सहनी पड़ती हैं व एक समय के पश्चात यह हिंसक रूप ले लेता है। 

घरेलू हिंसा केवल महिलाओं को ग्रस्त नहीं करता बल्कि अठारह वर्ष से कम बालक बालिकाएं भी इससे प्रभावित हैं । घरेलू हिंसा महिला एवं बच्चे के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन के संकट, आर्थिक क्षति और ऐसी क्षति जो असहनीय हो तथा जिसके फलस्वरूप महिला एवं बच्चे दोनों को दुख एवं अपमान सहना पड़े थे सभी घरेलू हिंसा के दायरे में शामिल हैं।

कोविड19 महामारी के कारण कई समस्याएं उत्पन्न हुई। इस महामारी ने विश्व के लगभग सभी देशों को ग्रस्त किया जिसके फलस्वरूप देशों की अर्थव्यवस्था भी ढगमगा उठी । हमारे देश भारत में इसने कईं चुनौतियां उत्पन्न की - देश में बेरोजगारी अधिक बढ़ गई जो लोग छोटे रोजगार से अर्थ कमाते थे उन्हें समय पर वेतन नहीं मिला । इस महामारी के कारण कई लोगों ने अपने सगे-संबंधियों को खोया ।


इस तत्कालीन परिस्थिति के अनुरूप समाज में लोग धैर्यहीन हो गए, अवसाद, चिंता आदि अन्य मानसिक बिमारियों से ग्रस्त हो गए । इन्हीं के कारण 'घरेलू हिंसा' तलाक आदि के मामलों में वृद्धि भी हुई है।

कोविड19 एक महामारी है जो तेजी से लोगों को अपने प्रभाव से ग्रस्त कर चुकी है लेकिन घरेलू हिंसा एक ऐसी महामारी है जो धीरे-धीरे समाज की जड़ों का क्षय करती जा रही है। घरेलू हिंसा भी एक समानान्तर महामारी है जो हमारे समाज को एक गहरी क्षति पहुंचा रही है लेकिन इस ओर किसी का ध्यान आकृष्ट नहीं होता क्योंकि यह धीमी गति से समाज को पतन की ओर ले जा रही है।

घरेलू हिंसा का शिकार अधिकतर महिलाएं होती हैं, उन्हें पैर की जूती के समान समझा जाता है लेकिन वह महिला ही है जो परिवार के सुख के लिए अपनी समस्त इच्छाओं का त्याग कर देती है अपितु नारी सिर का ताज है वह परोपकार की स्वामिनी है जिसका सदा ही सम्मान करना चाहिए।

कोविड 19 के दौरान बुजुर्गों के प्रति सेवा का भाव समाप्त हो गया है। आज पाश्चात्य प्रभाव के कारण उन्हें बोझ समझा जाने लगा है व इस महामारी के दौरान आर्थिक तंगी के कारण वे भी घरेलू हिंसा के साक्षी बने। इस समय के दौरान दूर्वृत्तता पूर्ण संवाद घरेलू हिंसा को बढ़ावा देते हैं।

इस घरेलू हिंसा नामक महामारी का टीकाकरण घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 में हुआ लेकिन इसका प्रभाव बहुत कम क्षेत्रों तक ही पहुंच पाया व इसका धीरे-धीरे विस्तार हो रहा है ।

घरेलू हिंसा अधिनियम से पहले विवाहित महिला के पास परिवार द्वारा मानसिक एवं शारीरिक रूप से प्रताड़ित किए जाने पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 498- क के तहत शिकायत करने का प्रावधान था । दहेज निषेध अधिनियम 1961 में वर्ष 1983 में हुए संशोधन के बाद धारा 498- क को जोड़ा गया। यह एक गैर जमानती धारा है।

आज इन दोनों महामारी से निपटने के लिए हमें स्वयं जागरूक बनना होगा व समाज को भी जागरूक करना होगा।



★ यह मेरी मौलिक रचना है। *

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