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Showing posts from July, 2021

खिलाड़ी !!!

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खिलाड़ी — चैंपियन के खून को बनाया जाता है चैंपियन:   खेल किसी के खून में नहीं होता, कठोर वह स्वयं को इतना बनाता, बड़े से बड़ा खिलाड़ी पस्त हो जाता, कोशिश वह इतनी करता, हार कर भी न पीछे मुड़ता, मग्न हो जाता वह इतना, कि छोड़कर सांसारिक जीवन, वह खेल को अपनाता, व विश्व नंबर एक बन जाता, जीवन की आकांक्षाएं त्यागता, बस ओलंपिक में गोल्ड लाना, उसका परम ध्येय रह जाता। *** Tokyo Olympics 2020🙌🇮🇳🇮🇳🇮🇳 खेल के महाकुंभ ओलंपिक खेलों में पूरे विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी अपनी स्पर्धा में सर्वश्रेष्ठ देते हैं। समाज को पता होना चाहिए की चार वर्षों में होने वाले इन खेलों में कोई भी अपना प्रदर्शन खराब नहीं करता केवल कुछ तकनीकी कठिनाई व एकाग्रता भंग होने से एक खिलाड़ी की वर्षों की साधना मानो एक झटके में छिन्न भिन्न हो जाती है।  देशवासियों को खिलाड़ियों का सकारात्मक दिशा में मनोबल बढ़ाना चाहिए व उन्हें और ऊंचे शिखर पर चढ़ने के लिए प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिए। स्वयं एक खिलाड़ी होते हुए मैंने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है और ये पंक्तियां मैंने 7 सितंबर 2018 को लिखी थीं। आज खेलों के शुभ अवसर पर...

रिश्वत ???

  क्यों लेते लोग दूसरों से हैं रिश्वत?  क्यों खोल रखी है दुकान कमाई की रिश्वत ?  क्यों खाते वे अपनी मेहनत की रिश्वत ?  मनुष्य को फसांती ऐसे जाल में रिश्वत,  निकल न पाए उसमें से जन्मों - जन्म तक रिश्वत,  खींचती अपनी ओर यह है लालच रिश्वत,  इससे दूर जो रहे वह है आदमीयत की मूरत । स्व - रचित पंक्तियां जो मैंने 5 सितंबर 2018 को व्यक्त किए थे। आज इन विचारों को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाने का प्रयास कर रही हूं।🙏🏻🙏🏻

वर्तमान में युवाओं के प्रेरणास्त्रोत - आर्य समाज के नियम

  विचारात्मक निबंध आज के इस युग में सोशल मीडिया के आतंक फलस्वरूप युवा पीढ़ी पथभ्रष्ट एवं विपरीत स्थिति में असहिष्णुता का परिचय देती है। कुछ पैसों के लालच में युवा विपरीत संगठनों का हिस्सा बन जाते हैं और आवेश में आकर देशद्रोही की छवि भी बन जाते हैं व समाज को गरलमय बनाने का प्रयास करते हैं । युवाओं में घटते नैतिक मूल्य आज हिंसा का कारण बन रहे हैं। हम युवाओं को राष्ट्र निर्माता मानते हैं क्योंकि किसी भी देश की उन्नति का भार युवा पीढ़ी पर होता है यदि युवा पीढ़ी पथ से भ्रष्ट होगी तो देश उन्नति की ओर अग्रसर नहीं हो पाएगा। सुन 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने बंबई में मथुरा के स्वामी विरजानन्द की प्रेरणा से आर्य समाज जो कि एक हिन्दू सुधार आंदोलन था उसकी स्थापना की । यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया फलस्वरूप हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य हिन्दू धर्म में सुधार करना था। आर्य समाज में शुद्ध वैदिक परंपरा में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, अंधविश्वास को अस्वीकार करते थे व समाज की कुरीतियों का भी विरोध करते थे जैसे छुआछूत, जातिगत भेदभाव आदि एवं स्त्रियों व शूद्रों को भी यज्ञ...

गुरु पूर्णिमा विशेष अंक।

है वाणी में आपके ज्ञान का तेज़ प्रखर, ज्ञान का सौंदर्य आता मुख पर, मानो सूरजमुखी खिला हो धरती पर, रुख करता प्रत्येक छात्रा की ओर, कद - काठ खड़ा अपने ज्ञान के बल पर, शरीर कितना ही थका हो पर, छोड़कर हर पीड़ा कमरे के बाहर, वे पढ़ाते हमें बनाने के लिए विद्वान, इस धरती पर, प्रेरित करते पढ़ने के लिए, न बोझ लेकर दिल पर, आनंद लेना सिखाते प्रत्येक नीरस पाठ में जोश भरकर, लीन कर लेते हमें स्वयं के भीतर, जैसे कमल के पत्ते ने पानी को अपने अंदर।। विशेष अंक  गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर अपने सभी गुरुओं के लिए 🙏🏻 🙏🏻 यह मेरी स्व - रचित पंक्तियां हैं।

लॉकडाउन एवं सृजनात्मकता

संकट की इस घड़ी में ना घबराना, प्रभु का गुणगान करते रहना, स्वच्छता का नियम कोरोना ने बतलाया, हमें इसका पालन जरूर है करना। हाथ मिलाने से अब हमें है बचना, नमस्ते करके ही स्वागत करना, मुंह पर हाथ लगाने से बचना, हाथों को तुम ऐसे धोना, कि छूटे ना इसका एक भी कोना, और बीस सेकेंड तक इन्हें साफ करना। व्यस्त जीवन से समय परिवार के लिए मिला, मां का चेहरा भी तो बड़े दिन बाद खिला, पिताजी ने रसोई में मां का हाथ बंटाया, और अपने अनुभवों को दोहराया। साथ मिलकर पुराने खेल खेलना, कुछ यादें पुरानी ताज़ा करना, व्यायाम ,प्राणायाम नित्य करते रहना, प्रातः शीघ्र उठना भूल ना जाना, हो आवश्यक जब, तो सारे सज - संवर कर ना चल देना, किसी एक को ही इसका भार सौंपना। उम्मीद की किरण अब ना छोड़ना, विभिन्न कार्यों में अपनी रुचि दिखाना,  अपने टैलेंट को अब निखारना, ऑनलाइन माध्यम से कार्य जारी रखना, आंखों का भी ध्यान रखना, किताबी क्रीड़ा को भूल ना जाना, प्रकृति का उज्ज्वल रूप देखना, निरभ्र प्राची का सवेरा होने देना, हे श्रेष्ठ मानव अधीर ना होना, निष्ठुर समय में धैर्य ना त्यागना, लोकडाउन का सख्ती से पालन करना, और वसुधैव कुटुं...

कठिन दौर की सीख।

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क्यों मैं हताश हो जाऊं कठिन दौर में? यह दौर सिखाता मुझे, जीना कलियुग के दौर में, जीवन का एक पहलू, देखती हूं मैं इस दौर में, सफलता भी अच्छी लगे, जब गुजरें हों इस दौर से, प्रेरित मैं स्वयं को करती, आगे बढ़ने के लिए इस दौर में, देखती हूं मैं मंजिल, है कितनी दूर इस दौर में। यह मेरी मौलिक रचना है, मेरे व्यक्तिगत विचार हैं जो मैंने 2.09.2018 को व्यक्त किए थे। Have patience 😇😇

मानवता - एक गाथा

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  दिमाग में चक्कर काट गई एक बात,  क्यों लोग करते पीछे से बात,  क्यों वे करते बात टेढ़ी खीर से,  क्यों नहीं कहते हैं वे साफ दिल से। दिमाग में चक्कर काट गई एक बात,  क्यों लोग दूसरों की खुशी में खुश नहीं होते, क्यों दुःख में सबको झूठी संवेदना हैं देते, क्या इतनी स्वाभीमानी है मानवता, क्या कलियुग है जिम्मेवार जो, झूठी शान का प्रदर्शन हैं करते। दिमाग में चक्कर काट गई एक बात, क्यों लोग जाने समझे बिना अपनी राय देते, क्यों लोग दूसरों से वैर हैं करते, क्यों लोग जीवन सरल सलीके से न जीते, क्यों लोग माया जाल में फँसकर रह जाते ? यह अहं मनुष्य का करता नाश,  जिसके कारण करता अपने जीवन का विनाश, जीवन है दूसरों का दूर करना कष्ट, जिससे मिलती असीम खुशी वह काम है सर्वश्रेष्ठ। नकारात्मक सोच करती उथल-पुथल जीवन में, देती है भटका हमें अपने लक्ष्य से जीवन में, यह बातें हमारा दिमाग कर लेती हैं वश में, मनुष्य को सोचने न दे आगे जीवन में। नकारात्मक सोच वाला व्यक्ति रह जाता अकेला जीवन में, न कोई खुशी केवल गम ही गम है जीवन में, मस्त रहता वह अपने अकेलेपन के जीवन में, परन्तु रह जाता अकेला जी...

कोविड 19 के दौरान घरेलू हिंसा - एक समानांतर महामारी

 'घरेलू हिंसा' से तात्पर्य है ऐसी हिंसा जो निजी, आपसी मतभेद के कारण उत्पन्न हो | हमारा भारतीय समाज अंग्रेजों से आजाद होने के बाद पितृसत्ता का गुलाम हो गया जिसके फलस्वरूप महिलाओं की शक्ति क्षीण हो गई। आज़ादी से पहले जहाँ हमें अनेक वीरांगनाओं की कहानी सुनने को मिलती हैं जिन्होंने अपने पराक्रम से अंग्रेजों के दांत खट्टे किए थे। वहीं यदि हम आजादी के बाद की नारियों को देखें वे कहीं न कहीं पितृसत्ता के भार के नीचे दब गईं । कई वर्षों तक महिलाएं इसी प्रणाली के अंतर्गत केवल एक घरेलू बंधन से युक्त रही । भारतीय समाज में दहेज प्रथा का चलन रहा, जो कई महिलाओं को पीड़ित कर चुका है । इस प्रथा के कारण लड़की के परिवार वालों से कई वस्तुएं उपहार स्वरूप ली जाती है जब विवाह होता है। उचित मात्रा में दहेज न मिलने के कारण ससुराल में लड़की को अनेक यातनाएं सहनी पड़ती हैं व एक समय के पश्चात यह हिंसक रूप ले लेता है।  घरेलू हिंसा केवल महिलाओं को ग्रस्त नहीं करता बल्कि अठारह वर्ष से कम बालक बालिकाएं भी इससे प्रभावित हैं । घरेलू हिंसा महिला एवं बच्चे के स्वास्थ्य, सुरक्षा, जीवन के संकट, आर्थिक क्षति और ऐसी क्ष...