रिश्वत ???
क्यों लेते लोग दूसरों से हैं रिश्वत?
क्यों खोल रखी है दुकान कमाई की रिश्वत ?
क्यों खाते वे अपनी मेहनत की रिश्वत ?
मनुष्य को फसांती ऐसे जाल में रिश्वत,
निकल न पाए उसमें से जन्मों - जन्म तक रिश्वत,
खींचती अपनी ओर यह है लालच रिश्वत,
इससे दूर जो रहे वह है आदमीयत की मूरत ।
स्व - रचित पंक्तियां जो मैंने 5 सितंबर 2018 को व्यक्त किए थे। आज इन विचारों को व्यष्टि से समष्टि की ओर ले जाने का प्रयास कर रही हूं।🙏🏻🙏🏻
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