वर्तमान में युवाओं के प्रेरणास्त्रोत - आर्य समाज के नियम
विचारात्मक निबंध
आज के इस युग में सोशल मीडिया के आतंक फलस्वरूप युवा पीढ़ी पथभ्रष्ट एवं विपरीत स्थिति में असहिष्णुता का परिचय देती है। कुछ पैसों के लालच में युवा विपरीत संगठनों का हिस्सा बन जाते हैं और आवेश में आकर देशद्रोही की छवि भी बन जाते हैं व समाज को गरलमय बनाने का प्रयास करते हैं । युवाओं में घटते नैतिक मूल्य आज हिंसा का कारण बन रहे हैं। हम युवाओं को राष्ट्र निर्माता मानते हैं क्योंकि किसी भी देश की उन्नति का भार युवा पीढ़ी पर होता है यदि युवा पीढ़ी पथ से भ्रष्ट होगी तो देश उन्नति की ओर अग्रसर नहीं हो पाएगा।
सुन 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने बंबई में मथुरा के स्वामी विरजानन्द की प्रेरणा से आर्य समाज जो कि एक हिन्दू सुधार आंदोलन था उसकी स्थापना की । यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया फलस्वरूप हुआ जिसका मुख्य उद्देश्य हिन्दू धर्म में सुधार करना था। आर्य समाज में शुद्ध वैदिक परंपरा में विश्वास करते थे तथा मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि, अंधविश्वास को अस्वीकार करते थे व समाज की कुरीतियों का भी विरोध करते थे जैसे छुआछूत, जातिगत भेदभाव आदि एवं स्त्रियों व शूद्रों को भी यज्ञोपवीत धारण करने व वेद पढ़ने का अधिकार दिया था | स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रंथ आर्य समाज का मूल ग्रंथ है द्वारा रचित आर्य समाज का आदर्श वाक्य है "कृण्वन्तो विश्वमार्यम" जिसका अर्थ है - विश्व को आर्य बनाते चलो अर्थात विश्व को उत्तम, श्रेष्ठ, पूज्य बनाते चलो।
आर्य समाज के नियम वर्तमान में युवाओं के प्रेरणास्त्रोत हैं, नियम एक अमूल्य जान कोष लिए हुए हैं जो युवाओं का उचित मार्गदर्शन करते हैं । ये नियम इस प्रकार हैं:
1. सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सबका आदि मूल परमेश्वर है।
इसका अर्थ है की संपूर्ण विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उनका आदि मूल परमेश्वर है। यह सत्य विद्या वेद है और वेद से जानी जाने वाली संपूर्ण सृष्टि, इन दोनों का कर्ता परमात्मा है। अनित्य विद्या का कर्ता परमात्मा नहीं है अर्थात वेद में अनित्य इतिहास आदि विद्याएं नहीं है, भले ही वे विद्याएं यथार्थ हों। यह नियम युवाओं को भटकने से बचाता है कि वे अन्य भिन्न - भिन्न भ्रांतियों के जाल में फंस जाते हैं एवं जीवन के लक्ष्य से भटक जाते हैं। युवाओं की इस नियम से प्रेरणा मिलती है कि वे किसी अज्ञानी की बातो में न आकर अपना जीवन सुखी - सुखी व्यतीत करें।
2. ईश्वर सच्चिदानंद स्वरुप, निराकार, सर्व शक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, सर्व शक्तिमान, अनादि, अनुपम, सर्वाधर, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है।
आर्य समाज के दूसरे नियम में ईश्वर के गुणों की व्याख्या की गई है जो युवाओं की भ्रांति का निवारण करती है कि ईश्वर सत, चित और आनंद स्वरूप है, उसका कोई आकार नहीं है, सर्व शक्तिमान है, न्याय करने वाला है यदि कहीं अन्याय होता है तो, दयालु भी है सबके प्रति दया भाव रखते हैं, उन्होंने जन्म नहीं लिया है वे अनंत हैं, कोई विकार नहीं है, ब्रम्हांड के कण - कण में हैं, नित्य पवित्र एवं सृष्टि को रचने वाला है उसी की उपासना हमें करनी चाहिए। आज युवा विभिन्न पंडितो के जाल में फंस कर उन्हीं की उपासना करने लग जाते हैं। यह नियम ऐसे युवाओं को सतमार्ग दिखाता है और प्रेरित भी करता है कि हमें सदा उचित नियमों की अनुपालना करनी चाहिए व किसी के साथ अन्याय नहीं करना चाहिए।
3. वेद सब सत्यवियाओं की पुस्तक है। वेद का पढ़ना पढ़ना और सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है ।
इसका अर्थ यह है कि वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तक है। संसार में जितनी भी सुत्य विद्याएं हैं, उन सब का आदि मूल वेदों में पाया जाता है । वेद विद्या के भंडार हैं व निर्भ्रांत ग्रंथ भी हैं। इनमें कोई भी असत्य विद्या नहीं है । सत्यज्ञान की प्राप्ति के लिए व मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने के लिए वेदों का पठन- पाठन आवश्यक है । युवा पीढ़ी इसका अनुसरण करने से कईं विद्याओं का ज्ञान सीख सकती है । सभी ज्ञान-विज्ञान वेदों में लिखित हैं, इसका पठन करने मात्र से ही युवा विद्वान बन सकता व समाज उन्नति में सहायक बन सकता है।
4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।
यह नियम युवाओं को प्रेरणा देता है कि उन्हें हमेशा सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए | साथ ही विषम परिस्थितियों में भी सत्य का ही साथ देना चाहिए जिससे की समाज की उन्नति हो सके व समाज में एकता का संदेश सत्य के साथ पहुंचा सके।
5. सब काम धर्मानुसार अर्थात सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहिए।
इस नियम से युवाओं को प्रेरणा मिलती है कि उन्हें सब कार्य सोच समझकर सही-गलत को ध्यान में रखते हुए करने चाहिए अर्थात धर्मानुसार अपने कार्यानुसार करने चाहिए। यदि किसी स्थिति से वह अपरिचित है तो उस कार्य को नहीं करना चाहिए या किसी विद्वान की सहायता से वह कार्य करना चाहिए।
6. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना ।
इस नियम में आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य बताया गया है व उन युवाओं को एक लक्ष्य दिया गया है जो जीवन के उद्देश्य से अपरिचित हैं। संसार का उपकार करना उसके कल्याण में, हित में कार्य करना मुख्य उद्देश्य है। हमें दूसरों का उपकार भी करना चाहिए जिसके फलस्वरूप मानव समाज एक आर्य समाज बन पाएगा।
7. सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिए।
इस पृथ्वी पर मानव को सबसे श्रेष्ठ, बुद्धिमान जीव माना जाता है फलस्वरूप उसे प्रत्येक जीव के प्रति प्रेम प्रकट करना चाहिए, कर्मानुसार,जैसे को तैसा यह वृति रखनी चाहिए यदि कोई दूसरा व्यक्ति आपका शोषण करता है तो उसके खिलाफ एकजुट होकर आवाज उठानी चाहिए। युवा पीढ़ी जो अपने मनोरंजन के लिए मूक जीवों को हानि पहुंचाते हैं वो गलत है।
8. अविद्या का नाश और विया की वृद्धि करनी चाहिए।
युवा पीढ़ी को यह संदेश मिलता है कि उन्हें समाज में अंधविश्वास या अज्ञानता का नाश करना है फलस्वरूप विद्या की वृद्धि संभव हो पाएगी। इस स्वतंत्र और जनतंत्र के युग में शिक्षा और विद्या आवश्यक है एवं सभी के लिए बिना किसी भेदभाव के और अज्ञान व अविद्या अभिशाप है जिसे हम अर्ध ज्ञान कह सकते हैं। अंधविश्वास से पर्दा उठाना ही विद्या व ज्ञान की वृद्धि संभव हो पाएगी।
9. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।
यदि युवा केवल अपनी उन्नति से संतुष्ट होकर बैठ जाएगा तो समाज की उन्नति नहीं कर पाएगा। व्यक्ति को अपनी उन्नति के साथ-साथ अपने कुटुंब की उन्नति का भी ध्यान रखना चाहिए। अपने आस - पास के व्यक्तियों से वैर भावना नहीं रखनी चाहिए। 'वसुधैव कुटुंबकम' संपूर्ण विश्व एक परिवार है इसलिए सबकी खुशी में भी अपनी खुशी समझनी चाहिए।
10. सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें।
इस नियम में बताया गया है कि किस अवस्था और क्षेत्र में मनुष्य को स्वतंत्रता से अर्थात अपनी इच्छा से कार्य करना चाहिए और किस अवस्था में तथा क्षेत्र में उसे काम करते समय अपनी इच्छा को एक ओर रखकर समाज के हित का ध्यान रखते हुए सामाजिक एवं राष्ट्रीय नियमों के अनुसार आचरण करना चाहिए।
आर्य समाज के नियम युवाओं के प्रेरणास्त्रोत हैं। ये आर्य समाज के दस नियम उन्हें उदार तथा सबकी भलाई करने के लिए प्रेरित करते हैं व एक आर्य समाज - एक श्रेष्ठ समाज बनाने की ओर युवाओं को आकर्षित करते हैं व किसी भी मोह जाल में फंसने से भी बचाते हैं।
इन नियमों की अनुपालना करने से वर्तमान में युवा पीढ़ी एक नवजागरण समाज की उन्नति कर सकती है व शांति एवं सद्भावना जैसे विचारों से अन्य देशों को भी शांति का संदेश दे सकती है ।
स्व - रचित निबंध कि कैसे आर्य समाज के नियम युवाओं को श्रेष्ठ कार्यों में संलग्न होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
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