उमस...
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| 'धूप और बदल की जोड़ी ' |
अरे बादल ! कैसे तुम बरसे,
मानो खिन्न - से हो हमसे,
प्रतीक्षा थी हमें आपकी कब से,
और देखो रुष्ट से तुम बरसे,
भीषण गर्मी क्या कम थी,
जो तुम ऐसे हो बरसे,
उमस है इतनी,
सीकर में स्नान किया हो जैसे।
न ही आते बदरा तुम अच्छे,
सहते तीक्ष्ण गर्मी हम वो अच्छे,
इतना कम तो न बरसो,
पृथ्वी की शांति का ख्याल रखो,
त्राहि-त्राहि न मचने दो
नीर विलुप्त न होने दो,
जल पूर्ति मरुस्थल में किया करो,
यूहिँ तुम आद्रि पर मोहित मत हुआ करो,
बस कुछ क्षण झम-झम बरसा करो,
वीर तुम सदैव शीतल बयार लिए रहो,
यदि न भी तुम बरसो,
शीतल बयार चलाया करो,
मानव मन को ठंडक पहुंचाया करो।
स्व रचित पंक्तियां जो मैंने उमस से परेशान होकर लिखी और उमस की पीड़ा को कम करने का प्रयास किया। इन पंक्तियों को पढ़ कर मन तक स्वयं ही शीतलता पहुंच जाती है।🙏🏻🙏🏻📋📋☁️⛅🌧️🌦️


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